Tuesday, December 20, 2011

आ जाना साँवरिया प्यारे,रहेगी हर पल आने की आस तुम्हारी



आ जाना साँवरिया प्यारे,रहेगी हर पल आने की आस तुम्हारी

ओह कृष्ण ओह मेरे प्यारे,
करुनासिंधु तुम ही पालनहारे
छेडू मैं तो दिल की रागिनिया
सुनाओ तुम भी तान मतवाली
तुम बजाना धुन बंसी की
मैं आऊँगी भागी भागी
ओह मेरे सांवरिया,ओह मेरे रसिया
सुन लो सुन लो अब तो टेर हमारी
अब के आना होरी में,खेलेंगे जम के होरी
होगी याद तुम्हारी रसिया,जल होगा आँखों का मेरा
रंग जाना मोहे अपने रंग में,देखती रह जाए दुनिया सारी
आ जाना साँवरिया प्यारे,रहेगी हर पल आने की आस तुम्हारी

Tuesday, November 1, 2011

मोहन तूं समक्ष मेरे क्यों न आया

 आज मोहन तेरी याद ने बड़ा ही सताया 

कई बार मेरा दिल भर आया

आखीयों ने अश्रु जल बहाया

फिर भी इस दिल को चैन न आया

आज मोहन तेरी याद ने बड़ा ही सताया

हालत मेरी हुई हैं ऐसी

जिधर भी देखु तुझको ढून्दो

तुझी को पौन ,तुझे ही हर बात बताउ

आज मोहन तेरी याद ने बड़ा ही सताया

मोहन तूं समक्ष मेरे क्यों न आया

तुझे मैंने कई बार बुलाया

मगर तू क्यों न आया ?

Monday, October 17, 2011

Bhool Gaye Panghat Pe Oh Natnagar


This was the song for when Yashoda and Radha tease Krishna:

Radha Boli Na Tohse Batiya
Re Radha Na Boli
Radha Boli Na Tohse Batiya
Re Radha Na Boli
Nahi Ghungat Tanik Sarakaye
Nahi Ghungat Tanik Sarakaye
Nahi Ghungat Tanik Sarakaye
Nahi Ghungat Tanik Sarakaye
Re Radha Na Boli
Radha Boli Na Tohse Batiya
Re Radha Na Boli

Radha Ke Naino Ka Jhukna, Lajana
Kaise Niharoge Batalao Kanha
Radha Ke Naino Ka Jhukna, Lajana
Kaise Niharoge Batalao Kanha
Kahe Manva Adhir Hua Jaye
Kahe Manva Adhir Hua Jaye
Kahe Manva Adhir Hua Jaye
Kahe Manva Adhir Hua Jaye

Bhool Gaye Panghat Pe Oh Natnagar
Phodi Thi Kaisi Radha Ki Ghagar
Bhool Gaye Panghat Pe Oh Natnagar
Phodi Thi Kaisi Radha Ki Ghagar
Ab Behethe Raho Pachataye
Ab Behethe Raho Pachataye
Ab Behethe Raho Pachataye
Ab Behethe Raho Pachataye
Re Radha Na Boli
Radha Boli Na Tohse Batiya
Re Radha Na Boli

Sare Sakhiya Hai Hairan Kishan Ne


This was actually Kritika's opening song,
Chedi Aisi Taan
Chedi Aisi Taan Kishan Ne
Chedi Aisi Taan
Ek Radha Ke Sival
Koi Sun Nahi Paye
Sare Sakhiya Hai Hairan Kishan Ne
Chedi Aisi Taan
Chedi Aisi Taan
Barsane Ki Alhad Chori
Hue Krishn Mukh Chandra Chakori
Band Ke Ghoongaru Cham Cham Nache
Ude Hawa Sang Chunar Kori
Sara Jag Besura Ke
Nache Khud Ko Bhulake
Radha Rani Ke Tan Man Pran Kishan Ne
Chedi Aisi Taan
Chedi Aisi Taan 

Sunday, October 16, 2011

इसी दुविधा में हूँ श्याम


क्या लिखू क्या न लिखू
कैसे लिखू क्यों लिखू
इसी दुविधा में हूँ श्याम
तुम तो जानते ही हो न
मेरे हिये की हर बात
फिर क्यों लिखू
क्यों कहू कुछ भी तुम्हे
तुम्हे सबकुछ तो मालूम हैं
क्या छिपा हैं तुमसे
जो तुम्हे कुछ बताने का साहस करू
फिर भी नजाने क्यों
मेरे लबो पे आ जाती एक ही बात हैं
साँवरिया आ जाओ,अब न तड़पाओ
कहती तो हूँ यह पर तुम जानते हो
इस तड़पन के लिए भी कितना तडपती हूँ
नही चाहती मैं इस तड़पन से मुख मोड़ना
तेरी याद में जो मजा हैं
नही चाहती में वो छोड़ना
शायद इसीलिए तू
मेरी नजरो के सामने होकर भी मोहे तड़पाता हैं
सामने होकर भी नजरो को वो नजाकत न देता हैं
तू सामने हैं पर तेरे दीदार को तरसते हैं
क्या कहें अब इस तड़पन की बात
आनन्द की कोई सीमा नही तेरे प्रेम में मेरे घनश्याम
और मैं कुछ न जानने समझने वाली अनजान
कैसे पाऊ तेरा दीदार ,
तुम तो प्रेम समुन्द्र हो
मैं इक सूखा हुआ कतरा
कैसे गुण गाऊ तेरे घनश्याम
क्या लिखू क्या न लिखू
इसी दुविधा में हु श्याम

आप ही मेरे सबकुछ हैं,हरि! आपके कारण बल पाँऊ


आप ही मेरे सबकुछ हैं,हरि! आपके कारण बल पाँऊ 
मैं आपकी दासी बनी रहूँ, मैं आपके रूप से चल जाऊं
करुणा और दया की मूर्त हो,प्रेम प्यार की सूरत हो,
मैं आपके रूप में बलिहारी, मैं आपके पथ पर चल पाँऊ 
मुझे आपका काज ही करना हैं,मुझे नेक राह पर चलना हैं 
मैं आपके दर पर पड़ी रहूँ, मैं आपका गुण और बल गाऊं
'हरि'!आप ही मेरे प्रियतम हो, मैं गीत तो आप ही सरगम हो 
जीते मरते मैं आपकी हूँ,''कृष्णा आकषिणी गौरी  आपमें मिल जाऊं
कृष्णा आकषिणी गौरी
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मेरी हर इक साँस लेती, तेरा ही हरि नाम हैं


मेरे प्राणों का सहारा मेरी ही वे आन हैं 
मेरी हर इक साँस लेती, तेरा ही हरि नाम हैं 
कुछ नही हू मुरारी, तेरी ही बस शान हू 
जानो दिल का दर्द मेरा, करुना कर तू जान ले
अब तो चरणों में ही ले लो, इतना ही अब मान ले 
'कृष्णा आकषिणी गौरी  ' की यह दिल की पीड़ा, को हरि पहचान ले 
ऐ जाने तमन्ना  मेरे मनमोहन ऐसे न मुझको तडफाओ
में प्यासी हु तेरे दरसन की अब तो मोहे दरस दिखाओ
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तेरे नाम की मस्ती हरदम छाए


ओह मेरे गिरधर गोपाला
मैं तेरी तू मेरा
तेरे नाम से धन्य हुआ अंतर मन मेरा
ओह मेरे गिरधर गोपाला
मैं तेरी तू मेरा
तेरे नाम की मस्ती हरदम छाए
देखू हरदम रूप छवि तोरी
नैनों में मेरे तू बस जाए
ओह मेरे गिरधर गोपाला
मैं तेरी तू मेरा
मुझमे भी तो तुम्ही समाए
कैसी हैं फिर यह दूरी
क्यों तेरी याद सताये
क्यों रोम रोम दर्शन को तेरे, मेरा तड़प जाए
ओह मेरे गिरधर गोपाला
मैं तेरी तू मेरा
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धीरे से आना मोहन, तुम से लगन हैं लागी


इस प्रेम की गली में, धीरे से चरण धरना
कोमल बहुत ही दिल हैं, तुम से सुरत हैं लागी 
धीरे से खोलो द्वारा, खटका ना होवे भारी
मैं ध्यान में हू बैठी, बंसी ना छेडो रागी 
तुम में ही खोई बैठी, जग की भुलाई सुध हैं
मेरे प्यारे मोहन गौरी को गले लगा के 
एहसास अपना कराओ ----धीरे से आना मोहन, तुम से लगन हैं लागी
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दरस प्यास लागी हैं मनमोहन


दरस प्यास लागी हैं मनमोहन
अब आ जाओ
दो बूँद अपने प्रेम समुन्द्र की
हमको भी तो पिला जाओ
नैनो का जल बन के धारा
बहता ही जाए तो क्या करू
रोके से भी न रुक पाए
तो तू ही बता मैं क्या करू
तेरे बिन कहीं चित लगता नही
तेरे नैनो के सिवा कहीं और
डूबने को मन करता ही नही
तो बता न मनमोहन बता
मैं क्या करू?कब आएगा तू
कब इन नैन बरसात की आस पुजाएगा तू
ऐ श्याम कब आएगा तू
अब और न कर देर
मोहे तू अपने हिये में समा ले
मोहे तू अपना बना ले
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Sunday, September 18, 2011

भ्रमर गीत : सूरदास


कृष्ण जब गुरु संदीपन के यहाँ ज्ञानार्जन के लिये गए थे तब उन्हें ब्रज की याद सताती थी। हाँ उनका एक ही मित्र था उध्दववह सदैव रीति-नीति की,निगुर्ण ब्रह्म और योग की बातें करता था। तो उन्हें चिन्ता हुई कि यह संसार मात्र विरक्तियुक्त निगुर्ण ब्रह्म से तो चलेगा नहींइसके लिये विरह और प्रेम की भी आवश्यकता है। और अपने इस मित्र से वे उकताने लगे थे कि यह सदैव कहता हैकौन माताकौन पिताकौन सखाकौन बंधु। वे सोचते इसका सत्य कितना अपूर्ण और भ्रामक है। भला कहाँ यशोदा और नंद जैसे माता-पिता होने का सुख और राधा के साथ बीते पलों का आनंद। और तीनों लोकों में ब्रज के गोप-गोपियों के साथ मिलकर खेलने जैसा सुख कहाँऐसा नहीं है कि द्वारा उध्दव को ब्रज संदेस लेकर भेजते समय कृष्ण संशय में न थेवे स्व्यं सोच रहे थे यह कैसे संदेस ले जाएगा जो कि प्रेम का मर्म ही नहीं समझताकोरा ब्रर्ह्मज्ञान झाडता है
तबहि उपंगसुत आई गए।
सखा सखा कछु अंतर नाहिं, भरि भरि अंक लए।।
अति सुन्दर तन स्याम सरीखो, देखत हरि पछताने ।
ऐसे कैं वैसी बुधी होती, ब्रज पठऊं मन आने।।
या आगैं रस कथा प्रकासौं, जोग कथा प्रकटाऊं।
सूर ज्ञान याकौ दृढ क़रिके, जुवतिन्ह पास पठाऊं।।
तभी उपंग के पुत्र उध्दव आ जाते हैं। कृष्ण उन्हें गले लगाते हैं
दोनों सखाओं में खास अन्तर नहीं। उध्दव का रंग-रूप कृष्ण के समान ही हैपर कृष्ण उन्हें देख कर पछताते हैं कि इस मेरे समान रूपवान युवक के पास काशप्रेमपूर्ण बुध्दि भी होती। तब कृष्ण मन बनाते हैं कि क्यों न उध्दव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाएसंदेस भी पहुँच जाएगा और इसे प्रेम का पाठ गोपियाँ भली भाँति पढा देंगी। तब यह जान सकेगा प्रेम का मर्म
उधर उध्दव सोचते हैं कि वे विरह में जल रही गोपियों को निगुर्ण ब्रह्म के प्रेम की शिक्षा दे कर उन्हें इस सांसारिक प्रेम से की पीडा मुक्ति से मुक्ति दिला देंगेकृष्ण मन ही मन मुस्का कर उन्हें अपना पत्र थमाते हैं कि देखते हैं कि कौन किसे क्या सिखा कर आता है
उध्दव पत्र गोपियों को दे देते हैं और कहते हैं कि कृष्ण ने कहा है कि -
सुनौ गोपी हरि कौ संदेस।
करि समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनको उपदेस।।
वै अविगत अविनासी पूरन, सब घट रहे समाई।
तत्वज्ञान बिनु मुक्ति नहीं, वेद पुराननि गाई।।
सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इक चित्त एक मन लाई।
वह उपाई करि बिरह तरौ तुम, मिले ब्रह्म तब आई।।
दुसह संदेस सुन माधौ को, गोपि जन बिलखानी।
सूर बिरह की कौन चलावै, बूडतिं मनु बिन पानी।।
हे गोपियोंहरि का संदेस सुनो। उनका यही उपदेस है कि समाधि लगा कर अपने मन में निगुर्ण निराकार ब्रह्म का ध्यान करो। यह अज्ञेयअविनाशी पूर्ण सबके मन में बसा है। वेद पुराण भी यही कहते हैं कि तत्वज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसी उपाय से तुम विरह की पीडा से छुटकारा पा सकोगी। अपने कृष्ण के सगुण रूप को छोड उनके ब्रह्म निराकार रूप की अराधना करो। उध्दव के मुख से अपने प्रिय का उपदेश सुन प्रेममार्गी गोपियाँ व्यथित हो जाती हैंअब विरह की क्या बात वे तो बिन पानी पीडा के अथाह सागर डूब गईं

तभी एक भ्रमर व
हाँ आता है तो बस जली-भुनी गोपियों को मौका मिल जाता है और वह उध्दव पर काला भ्रमर कह कर खूब कटाक्ष करती हैं
रहु रे मधुकर मधु मतवारे।
कौन काज या निरगुन सौं, चिरजीवहू कान्ह हमारे।।
लोटत पीत पराग कीच में, बीच न अंग सम्हारै।
भारम्बार सरक मदिरा की, अपरस रटत उघारे।।
तुम जानत हो वैसी ग्वारिनी, जैसे कुसुम तिहारे।
घरी पहर सबहिनी बिरनावत, जैसे आवत कारे।।
सुंदर बदन, कमल-दल लोचन, जसुमति नंद दुलारे।
तन-मन सूर अरपि रहीं स्यामहि, का पै लेहिं उधारै।।
गोपियाँ भ्रमर के बहाने उध्दव को सुना-सुना कर कहती र्हैं हे भंवरे। तुम अपने मधु पीने में व्यस्त रहोहमें भी मस्त रहने दो। तुम्हारे इस निरगुण से हमारा क्या लेना-देना। हमारे तो सगुण साकार कान्हा चिरंजीवी रहें। तुम स्वयं तो पराग में लोट लोट कर ऐसे बेसुध हो जाते हो कि अपने शरीर की सुध नहीं रहती और इतना मधुरस पी लेते हो कि सनक कर रस के विरुध्द ही बातें करने लगते हो। हम तुम्हारे जैसी नहीं हैं कि तुम्हारी तरह फूल-फूल पर बहकें,हमारा तो एक ही है कान्हा जो सुन्दर मुख वालानीलकमल से नयन वाला यशोदा का दुलारा है। हमने तो उन्हीं पर तन-मन वार दिया है अब किसी निरगुण पर वारने के लिये तन-मन किससे उधार लें?
उधौ जोग सिखावनि आए।
सृंगी भस्म अथारी मुद्रा, दै ब्रजनाथ पठाए।।
जो पै जोग लिख्यौ गोपिन कौ, कत रस रास खिलाए।
तब ही क्यों न ज्ञान उपदेस्यौ, अधर सुधारस लाए।।
मुरली शब्द सुनत बन गवनिं, सुत पतिगृह बिसराए।
सूरदास संग छांडि स्याम कौ, हमहिं भये पछताए।।
गोपियाँ कहती र्हैं हे सखि! आओदेखो ये श्याम सुन्दर के सखा उध्दव हमें योग सिखाने आए हैं। स्वयं ब्रजनाथ ने इन्हें श्रृंगीभस्मअथारी और मुद्रा देकर भेजा है। हमें तो खेद है कि जब श्याम को इन्हें भेजना ही था तोहमें अदभुत रास का रसमय आनंद क्यों दिया थाजब वे हमें अपने अथरों का रस पिला रहे थे तब ये ज्ञान और योग की बातें कहाँ गईं थींतब हम श्री कृष्ण की मुरली के स्वरों में सुधबुध खो कर अपने बच्चों और पति के घर को भुला दिया करती थीं। श्याम का साथ छोडना हमारे भाग्य में था ही तो हमने उनसे प्रेम ही क्यों किया अब हम पछताती हैं
मधुबनी लोगि को पतियाई।
मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिख पठवत जु बनाई।।
ज्यौं कोयल सुत काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाई।
कुहुकि कुहुकि आएं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाई।।
ज्यौं मधुकर अम्बुजरस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातें आई।
सूर जहँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाई।।
कोई गोपी उध्दव पर व्यंग्य करती हैमथुरा के लोगों का कौन विश्वास करे?उनके तो मुख में कुछ और मन में कुछ और है। तभी तो एक ओर हमें स्नेहिल पत्र लिख कर बना रहे हैं दूसरी ओर उध्दव को जोग के संदेस लेके भेज रहे हैं। जिस तरह से कोयल के बच्चे को कौआ प्रेमभाव से भोजन करा के पालता है और बसंत रितु आने पर जब कोयलें कूकती हैं तब वह भी अपनी बिरादरी में जा मिलता है और कूकने लगता है। जिस प्रकार भंवरा कमल के पराग को चखने के बाद उसे पूछता तक नहीं। ये सारे काले शरीर वाले एक से हैंइनसे सम्बंध बनाने से क्या लाभ?
निरगुन कौन देस को वासी।
मधुकर कहि समुझाई सौंह दै, बूझतिं सांचि न हांसी।।
को है जनक, कौन है जननि, कौन नारि कौन दासी।
कैसे बरन भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी।।
पावैगो पुनि कियौ आपनो, जो रे करेगौ गांसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरो, सूर सबै मति नासी।।

अब गोपियों ने तर्क किर्या 
हाँ तो उध्दव यह बताओ कि तुम्हारा यह निर्गुण किस देश का रहने वाला हैसच सौगंध देकर पूछते हैंहंसी की बात नहीं हैइसके माता-पितानारी-दासी आखिर कौन हैंकैसा है इस निरगुण का रंग-रूप और भेषकिस रस में उसकी रुचि हैयदि तुमने हमसे छल किया तो तुम पाप और दंड के भागी होगे। सूरदास कहते हैं कि गोपियों के इस तर्क के आगे उध्दव की बुध्दि कुंद हो गई। और वे चुप हो गए। लेकिन गोपियों के व्यंग्य खत्म न हुए वे कहती रहीं -
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
मूरि के पातिन के बदलै, कौ मुक्ताहल देहै।।
यह ब्यौपार तुम्हारो उधौ, ऐसे ही धरयौ रेहै।
जिन पें तैं लै आए उधौ, तिनहीं के पेट समैंहै।।
दाख छांडि के कटुक निम्बौरी, कौ अपने मुख देहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरे, कौ निरगुन निरवेहै।।
हे उध्दव ये तुम्हारी जोग की ठगविद्याहाँ ब्रज में नहीं बिकने की। भला मूली के पत्तों के बदले माणक मोती तुम्हें कौन देगायह तुम्हारा व्यापार ऐसे ही धरा रह जाएगा। हाँ से ये जोग की विद्या लाए हो उन्हें ही वापस सिखा दो,यह उन्हीं के लिये उचित है। हाँ तो कोई ऐसा बेवकूफ नहीं कि किशमिश छोड क़र कडवी निंबौली खाए! हमने तो कृष्ण पर मोहित होकर प्रेम किया है अब तुम्हारे इस निरगुण का निर्वाह हमारे बस का नहीं
काहे को रोकत मारग सूधो।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तै, राजपंथ क्यौं रूंथौ।।
कै तुम सिखि पठए हो कुब्जा, कह्यो स्यामघनहूं धौं।
वेद-पुरान सुमृति सब ढूंढों, जुवतिनी जोग कहूँ धौं।।
ताको कहां परैंखों की जे, जाने छाछ न दूधौ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, ब्याज निवैरत उधौ।।
गोपियां चिढ क़र पूछती हैं कि कहीं तुम्हें कुबजा ने तो नहीं भेजाजो तुम स्नेह का सीधा साधा रास्ता रोक रहे हो। और राजमार्ग को निगुर्ण के कांटे से अवरुध्द कर रहे हो! वेद-पुरानस्मृति आदि ग्रंथ सब छान मारो क्या कहीं भी युवतियों के जोग लेने की बात कही गई हैतुम जरूर कुब्जा के भेजे हुए होअब उसे क्या कहें जिसे दूध और छाछ में ही अंतर न पता हो। सूरदास कहते हैं कि मूल तो अक्रूर जी ले गए अब क्या गोपियों से ब्याज लेने उध्दव आए हैं?
उधौ मन ना भए दस बीस।
एक हुतौ सौ गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।।
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस।
सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस।।
अब थक हार कर गोपियाँ व्यंग्य करना बंद कर उध्दव को अपने तन मन की दशा कहती हैं। उध्दव हतप्रभ हैंभक्ति के इस अद्भुत स्वरूप से। हे उध्दव हमारे मन दस बीस तो हैं नहींएक था वह भी श्याम के साथ चला गया। अब किस मन से ईश्वर की अराधना करेंउनके बिना हमारी इंद्रियां शिथिल हैंशरीर मानो बिना सिर का हो गया हैबस उनके दरशन की क्षीण सी आशा हमें करोडों वर्ष जीवित रखेगी। तुम तो कान्ह के सखा होयोग के पूर्ण ज्ञाता होतुम कृष्ण के बिना भी योग के सहारे अपना उध्दार कर लोगे। हमारा तो नंद कुमार कृष्ण के सिवा कोई ईश्वर नहीं है
गोपी उध्दव संवाद के ऐसे कई कई पद हैं जो कटाक्षोंविरह दशाओंराधा के विरह और निरगुण का परिहास और तर्क-कुतर्क व्यक्त करते हैं। सभी एक से एक उत्तम हैं पर यहाँ सीमा है लेख की
अंतत: गोपियाँ राधा के विरह की दशा बताती हैंब्रज के हाल बताती हैंअंतत: उध्दव का निरगुण गोपियों के प्रेममय सगुण पर हावी हो जाता है और उध्दव कहते हैं -
अब अति चकितवंत मन मेरौ
आयौ हो निरगुण उपदेसनभयौ सगुन को चैरौ
।।
जो मैं ज्ञान गह्यौ गीत कोतुमहिं न परस्यौं नेरौ

अति अज्ञान कछु कहत न आवैदूत भयौ हरि कैरौ
।।
निज जन जानि-मानि जतननि तुमकीन्हो नेह घनेरौ

सूर मधुप उठि चले मधुपुरीबोरि जग को बेरौ
।।
कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को देख कर उध्दव भाव विभोर होकर कहते र्हैं मेरा मन आश्चर्यचकित है कि मैं आया तो निर्गुण ब्रह्म का उपदेश लेकर था और प्रेममय सगुण का उपासक बन कर जा रहा हूँ। मैं तुम्हें गीता का उपदेश देता रहाजो तुम्हें छू तक न गया। अपनी अज्ञानता पर लज्जित हूँ कि किसे उपदेश देता रहा जो स्वयं लीलामय हैं। अब समझा कि हरि ने मुझे यहाँमेरी अज्ञानता का अंत करने भेजा था। तुम लोगों ने मुझे जो स्नेह दिया उसका आभारी हूँ। सूरदास कहते हैं कि उध्दव अपने योग के बेडे क़ो गोपियों के प्रेम सागर में डुबो केस्वयं प्रेममार्ग अपना मथुरा लौट गए
यह है भ्रमर गीत का स्नेहमय सार

Wednesday, September 14, 2011

ब्रज चौरासी कोस की परिकम्मा एक देत । लख चौरासी योनि के संकट हरिहर लेत ॥

सत्य, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत जो पराब्रह्म है, वही व्यापक है। इसीलिए उसे ही ब्रज कहते हैं। यह सच्चिदानन्द स्वरूप परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है।हमारे देश की पवित्र भूमि ब्रज का स्मरण करते ही हृदय प्रेम रस से सराबोर हो जाता है, एवं श्री कृष्ण के बाल रूप की छवि मन-मस्तिष्क पर अंकित होने लगती है। ये ब्रज की महिमा है की सभी तीर्थ स्थल भी ब्रज में निवास करने को उत्सुक हुए थे एवं उन्होने श्री कृष्ण से ब्रज में निवास करने की इच्छा जताई।
भगवान श्री कृष्ण द्वारा वन गोचारण से ब्रज रज का कण-कण कृष्णरूप हो गया है तभी तो समस्त भक्त जन यहाँ आते हैं और इस पावन रज को शिरोधार्य कर स्वयं को कृतार्थ करते हैं। ब्रज में तो विश्‍व के पालनकर्ता  माखनचोर बन गये। इस सम्पूर्ण जगत के स्वामी को ब्रज में गोपियों से दधि का दान लेना पड़ा। जहाँ सभी देव, ऋषि मुनि, ब्रह्मा, शंकर आदि श्री कृष्ण की कृपा पाने हेतु वेद-मंत्रों से स्तुति करते हैं, वहीं ब्रजगोपियों की तो गाली सुनकर ही कृष्ण उनके ऊपर अपनी अनमोल कृपा बरसा देते हैं
रसखान ने ब्रज रज की महिमा बताते हुए कहा है - "एक ब्रज रेणुका पै चिन्तामनि वार डारूँ" 
        वास्तव में महिमामयी ब्रजमण्डल की कथा अकथनीय है क्योंकि यहाँ श्री ब्रह्मा जी, शिवजी, ऋषि-मुनि, देवता आदि तपस्या करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार श्री ब्रह्मा जी कहते हैं-भगवान्! मुझे इस धरातल पर विशेषतः गोकुल में किसी साधारण जीव की योनि मिल जाय, जिससे मैं वहाँ की चरण-रज से अपने मस्तक को अभिषिक्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँ।
भगवान शंकर जी को भी यहाँ गोपी बनना पड़ा -
"नारायण ब्रजभूमि को, को न नवावै माथ, जहाँ आप गोपी भये श्री गोपेश्वर नाथ।
सूरदास जी ने लिखा है "जो सुख ब्रज में एक घरी, सो सुख तीन लोक में नाहीं"।
बृज की ऐसी विलक्षण महिमा है कि स्वयं मुक्ति भी इसकी आकांक्षा करती है -
मुक्ति कहै गोपाल सौ मेरि मुक्ति बताय।
ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त हो जाय॥
 
श्री कृष्ण जी उद्धव जी से कहते हैं
"’ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।
हंस-सुता की सुन्दर कगरी, अरु कुञ्जनि की छाँहीं। ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि - गहि बाहीं॥
यह  मथुरा कञ्चन की नगरी, मनि - मुक्ताहल जाहीं। जबहिं सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहीं॥
अनगन  भाँति करी बहु लीला, जसुदा नन्द निबाहीं। सूरदास  प्रभु रहे मौन ह्‍वै,  यह कहि - कहि पछिताहीं॥
--ब्रज की महिमा------
एक बार नन्दबाबा और यशोदा मैया ने सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन-यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट की। तो श्री कृष्ण जी ने उनसे कहा, "मैया, मैं सारे तीर्थों को ब्रज में ही बुला लेता हूँ। तुम ब्रज में ही सभी तीर्थ-स्थलों की दर्शन-यात्रा कर लेना। अतः समस्त तीर्थ ठाकुर जी की आज्ञानुसार ब्रज में निवास करने लगे। ऐसा माना गया है कि ब्रज-धाम की परिक्रमा-यात्रा सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने की थी। वत्स हरण के पश्‍चात् उनके अपराध की शान्ति के लिये स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने का आदेश दिया था। तभी से ब्रज यात्रा का सूत्रपात हुआ। श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र श्री वज्रनाभजी द्वारा भी ब्रज यात्रा की गयी थी। कालांतर में परम रसिक संत शिरोमणि श्री स्वामी हरिदासजी, श्री हरिवंश जी, श्रीवल्लभाचार्य जी, श्री हरिराम व्यास जी, श्री चैतन्य महाप्रभु जी आदि अनेक वैष्णव एवं गौड़ीय सम्प्रदाय आचार्यों द्वारा ब्रज यात्रा का सुत्र पात हुआ  जिसे आज भी लाखों भक्त प्रतिवर्ष करते हैं। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा करने से मनुष्य को चौरासी लाख योनियों से छुटकारा मिल जाता है।
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सर्वगुणमय, लीलामय, अखिलरसामृतमूर्ति श्री भगवान श्री कृष्ण


        श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं, अतएव उनके द्वारा सभी लीलाओं का सुसम्पन्न होना इष्ट है। वे ही सबके हृदयों में व्याप्त अन्तर्यामी हैं, वे ही सर्वातीत हैं और वे ही  हैं। पुरुषावतार, गुणावतार, लीलावतार, अंशावतार, कलावतार, आवेशावतार, प्रभवावतार, वैभवावतार और परावस्थावतार-सभी उन्हीं से होता है। उनके प्राकट्य में भी विभिन्न कारण हो सकते हैं और वे सभी सत्य हैं। भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य का समय था भाद्रपद अष्टमी की अर्धरात्रि और स्थान था अत्याचारी कंस का कारागार। पर स्वयं भगवान के प्राकट्य से काल, देश आदि सभी परम धन्य हो गये। उस मंगलमयी घटना को हुए पाँच हजार से अधिक वर्ष बीत चुके हैं परन्तु आज भी प्रति वर्ष श्री कृष्ण जी का प्राकट्योत्सव वही पवित्र भाद्रपद मास के पावनमयी कृष्ण पक्ष की मंगल अष्टमी को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
        मथुरा नगरी के महाराज उग्रसैन भगवान के भक्त थे, ऋषि-मुनियों की सेवा करना एवं अपनी प्रजा का हमेशा हित चाहना उनके लिये सर्वोपरि था। लेकिन उनका पुत्र कंस बहुत ही अत्याचारी था। प्रजा पर अत्याचार करना, ऋषि-मुनियों के यज्ञ में विघ्न डालना उसको प्रसन्नता प्रदान करता था एवं वह स्वयं को ही भगवान समझता था। एक बार उसने अपने पिता को ही बंदी बना लिया एवं स्वयं मथुरा नगरी का नरेश बन गया और प्रजा पर अत्याचार करने लगा, ऋषि-मुनियों के यज्ञ में विघ्न डालने लगा एवं अपने आपको भगवान कहलवाने के लिये मजबूर करने लगा। कंस ने अपनी बहिन का विवाह वासुदेव जी के साथ कर दिया। तभी भविष्यवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही कंस का काल होगा। इससे भयभीत होकर उसने अपनी बहिन देवकी और वासुदेव जी को कारागार में डाल दिया। मृत्यु के भय से उसने देवकी के छ: पुत्रों को जन्म लेते ही मार दिया। देवकी के सातवे गर्भ को संकर्षण कर योगमाया ने वासुदेव जी की दूसरी पत्‍नि रोहिणीजी के गर्भ में डाल दिया। इसके पश्‍चात् भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की मंगल अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण जी ने अवतार लिया। बड़-बड़े देवता तथा मुनिगण आनन्द में भरकर पृथ्वी के सौभाग्य की सराहना करने लगे।
       
 उनके नैन इस भव बाधा से पार लगा देते हैं। इसीलिए तो किन्हीं संत ने कहा है: -
मोहन नैना आपके नौका के आकार
जो जन इनमें बस गये हो गये भव से पार


ब्रज गोपिकायें उनके मनोहारी रूप की प्रशंसा करते हुए कहती हैं : -
आओ प्यारे मोहना पलक झाँप तोहि लेउं
न मैं देखूं और को न तोहि देखन देउं

कर लकुटी मुरली गहैं घूंघर वाले केस
यह बानिक मो हिय बसौ, स्याम मनोहर वेस

ब्रज मण्डल के कण कण में है बसी तेरी ठकुराई।


        जब-जब इस धराधाम पर प्रभु अवतरित हुए हैं उनके साथ साथ उनकी आह्लादिनी शक्ति भी उनके साथ ही रही हैं। स्वयं श्री भगवान ने श्री राधा जी से कहा है - "हे राधे! जिस प्रकार तुम ब्रज में श्री राधिका रूप से रहती हो, उसी प्रकार क्षीरसागर में श्री महालक्ष्मी, ब्रह्मलोक में सरस्वती और कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती के रूप में विराजमान हो।" भगवान के दिव्य लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जू के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जू प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहाँ आनन्द है वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है। आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अत: श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं। श्रीमद्भागवत् में श्री राधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है। किन्तु वह उसमें उसी प्रकार विद्यमान है जैसे शरीर में आत्मा। प्रेम-रस-सार चिन्तामणि श्री राधा जी का अस्तित्व आनन्द-रस-सार श्री कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला को प्रकट करता है। श्री राधा रानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य निरंतर आनन्द-रस-सार, रस-राज, अनन्त सौन्दर्य, अनन्त ऐश्‍वर्य, माधुर्य, लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं। श्री कृष्ण और श्री राधारानी सदा अभिन्न हैं। श्री कृष्ण कहते हैं - "जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं। जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।"
श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥
        वृन्दावन लीला लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टी से तो ग्यारह वर्ष की अवस्था में श्री कृष्ण ब्रज का परित्याग करके मथुरा चले गये थे। इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रणय की कल्पना भी नहीं हो सकती परन्तु अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक  ही हैं फ़िर भी श्री कृष्ण ने श्री ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दिव्य चिन्मय प्रेम-रस-सार विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्मा जी के द्वारा रस-राज-शेखर श्री कृष्ण और महाभाव स्वरूपा श्री राधा जी की विवाह लीला भी सम्पन्न हुई।
गोरे मुख पै तिल बन्यौ, ताहिं करूं प्रणाम। मानों चन्द्र बिछाय कै पौढ़े शालिग्राम॥
            रस राज श्री कृष्ण आनन्दरूपी चन्द्रमा हैं और श्री प्रिया जू उनका प्रकाश है। श्री कृष्ण जी लक्ष्मी को मोहित करते हैं परन्तु श्री राधा जू अपनी सौन्दर्य सुषमा से उन श्री कृष्ण को भी मोहित करती हैं। परम प्रिय श्री राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है-"जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ" ब्रज के रसिक संत श्री किशोरी अली जी ने इस भाव को प्रकट किया है।
आधौ नाम तारिहै राधा।
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥
        ब्रज रज के प्राण श्री ब्रजराज कुमार की आत्मा श्री राधिका हैं। एक रूप में जहाँ श्री राधा श्री कृष्ण की आराधिका, उपासिका हैं वहीं दूसरे रूप में उनकी आराध्या एवं उपास्या भी हैं। "आराध्यते असौ इति राधा।" शक्ति और शक्तिमान में वस्तुतः कोई भेद न होने पर भी भगवान के विशेष रूपों में शक्ति की प्रधानता हैं। शक्तिमान की सत्ता ही शक्ति के आधार पर है। शक्ति नहीं तो शक्तिमान कैसे? इसी प्रकार श्री राधा जी श्री कृष्ण की शक्ति स्वरूपा हैं। रस की सत्ता ही आस्वाद के लिए है। अपने आपको अपना आस्वादन कराने के लिए ही स्वयं रसरूप श्यामसुन्दर श्रीराधा बन जाते हैं। श्री कृष्ण प्रेम के पुजारी हैं इसीलिए वे अपनी पुजारिन श्री राधाजी की पूजा करते हैं, उन्हें अपने हाथों से सजाते-सवाँरते हैं, उनके रूठने पर उन्हें मनाते हैं। श्रीकृष्ण जी की प्रत्येक लीला श्री राधे जू की कृपा से ही होती है, यहाँ तक कि रासलीला की अधिष्ठात्री श्री राधा जी ही हैं। इसीलिए ब्रजरस में श्रीराधाजी की विशेष महिमा है।
ब्रज मण्डल के कण कण में है बसी तेरी ठकुराई।
कालिन्दी की लहर लहर ने तेरी महिमा गाई॥
पुलकित होयें तेरो जस गावें श्री गोवर्धन गिरिराई।
लै लै नाम तेरौ मुरली पै नाचे कुँवर कन्हाई॥

Tuesday, September 13, 2011

Radha / राधा


श्री कृष्ण की विख्यात प्राणसखी और उपासिका राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थी। राधा कृष्ण शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं। राधा की माता कीर्ति के लिए 'वृषभानु पत्नी' शब्द का प्रयोग किया जाता है। राधा को कृष्ण की प्रेमिका और कहीं-कहीं पत्नी के रुप में माना जाता हैं। राधा वृषभानु की पुत्री थी। पद्म पुराण ने इसे वृषभानु राजा की कन्या बताया है। यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, इसे भूमि कन्या के रूप में राधा मिली। राजा ने अपनी कन्या मानकर इसका पालन-पोषण किया। यह भी कथा मिलती है कि विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। तभी राधा भी जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की सखी थी और उसका विवाह रापाण अथवा रायाण नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। अन्यत्र राधा और कृष्ण के विवाह का भी उल्लेख मिलता है। कहते हैं, राधा अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी।
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ब्रज में राधा का महत्व सर्वोपरि हैं। राधा के लिए विभिन्न उल्लेख मिलते हैं। राधा के पति का नाम ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार रायाण था अन्य नाम रापाण और अयनघोष भी मिलते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार कृष्ण की आराधिका का ही रुप राधा हैं। आराधिका शब्द में से अ हटा देने से राधिका बनता है। राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। यहाँ राधा का मंदिर भी है। राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ की लट्ठामार होली सारी दुनियाँ में मशहूर है। यह आश्चर्य की बात हे कि राधा-कृष्ण की इतनी अभिन्नता होते हुए भी महाभारत या भागवत पुराण में राधा का नामोल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि कृष्ण की एक प्रिय सखी का संकेत अवश्य है। राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया। कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेम-भाव में और भी वृद्धि हुई। दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे। राधा-कृष्ण की भक्ति का कालांतर में निरंतर विस्तार होता गया। निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-सम्प्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने इसे और भी पुष्ट किया।